“शक्ति धर्म की स्थापना के लिए,
समृद्धि समर्थ समाज के लिए,
और सेवा सशक्त राष्ट्र के लिए।”
हमारा संकल्प है कि हमारा परिवार विश्व का सबसे बड़ा, सक्षम, समर्थ, सशक्त और लोकहितकारी परिवार बने।
हमारे परिवार की अंतिम पंक्ति में बैठा कोई भी स्वजन कभी अपने आपको अकेला या असहाय महसूस न करे। सुख हो या संकट, शिक्षा हो या रोजगार, बीमारी हो या सामाजिक कठिनाई — हम सब बिना किसी अपेक्षा के अपने स्वजनों के साथ खड़े रहें।
यही हमारे संगठन की मूल भावना है —
“कोई स्वजन अकेला नहीं, कोई स्वजन असहाय नहीं।”
सनातन परंपरा के अनुसार भगवान श्रीहरि विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी धर्म, न्याय, तप, ज्ञान, साहस और अन्याय के प्रतिकार के प्रतीक हैं।
मां लक्ष्मी भगवान श्रीहरि विष्णु की दिव्य शक्ति तथा समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं।
भगवान परशुराम जी के “शस्त्र भी और शास्त्र भी” से प्रेरित धर्मशक्ति तथा मां अष्टलक्ष्मी की समग्र समृद्धि के आशीर्वाद और पूरे समाज के सहयोग से हमारा यह भागीरथी संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।
मेरा जन्म राजस्थान के चूरू जिले के दाऊदसर ग्राम के एक अत्यंत साधनहीन, किंतु संस्कारवान ब्राह्मण परिवार में हुआ। मेरे दादाजी गाँव के रघुनाथ मंदिर में पुजारी थे। परिवार के पास आर्थिक संसाधन सीमित थे और गाँव में रोजगार के अवसर लगभग नहीं थे।
अभाव क्या होता है, इसे मैंने केवल देखा नहीं, जिया है। परिस्थितियाँ ऐसी भी रहीं कि जीवन-यापन के लिए मुझे भिक्षा तक माँगनी पड़ी। गाँव में नामकरण एवं अन्य धार्मिक संस्कार करवाए। उस समय मेरे पास धन नहीं था, लेकिन परिवार से मिले संस्कार, ईमानदारी, परिश्रम और ईश्वर पर विश्वास की पूँजी अवश्य थी।
रोजगार और बेहतर भविष्य की तलाश मुझे वर्ष 1984 में गुवाहाटी ले आई। अनजान भूमि, सीमित संसाधन और संघर्षपूर्ण परिस्थितियाँ थीं, लेकिन पिताजी की शिक्षा और ईमानदारी के संस्कार साथ थे। छोटे-छोटे काम किए, कठिनाइयों का सामना किया और आत्मनिर्भर बनने का प्रयास जारी रखा।
महादेव की कृपा, परिवार के संस्कार और निरंतर परिश्रम से 15 फरवरी 1995 को पहली रोलिंग मिल स्थापित कर स्वतंत्र औद्योगिक यात्रा प्रारंभ की। जिस सफर की शुरुआत लगभग शून्य से हुई थी, वह समय के साथ उद्योग और रोजगार सृजन की एक व्यापक यात्रा में परिवर्तित होती गई।
आज सत्यम ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज के माध्यम से स्टील, सीमेंट, कोल माइनिंग, फेरो सिलिकॉन, कोक प्लांट्स, होटल एवं हॉस्पिटैलिटी तथा भवन निर्माण सहित विभिन्न क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित हैं और हजारों युवाओं को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कार्य के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
लेकिन मेरे लिए सफलता का वास्तविक अर्थ केवल उद्योगों का विस्तार नहीं है। मैं जहाँ से चला था, वह आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है। मैं उस बच्चे की परिस्थिति समझ सकता हूँ जो प्रतिभाशाली है, लेकिन उसकी फीस भरने वाला कोई नहीं। मैं उस युवा की बेचैनी समझ सकता हूँ जिसके पास योग्यता है, लेकिन अवसर और मार्गदर्शन नहीं। मैं उस परिवार की विवशता समझ सकता हूँ जो अपने होनहार बेटे-बेटी को उच्च शिक्षा दिलाना चाहता है, लेकिन आर्थिक परिस्थितियाँ उसके सपनों के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।
इसी जीवन-अनुभव से मेरे मन में एक प्रश्न बार-बार उठता रहा — “जिस अभाव से निकलने में मुझे वर्षों लगे, क्या समाज के किसी प्रतिभाशाली बच्चे को भी वही संघर्ष अकेले करना पड़े?”
मेरी अंतरात्मा का उत्तर था — नहीं। इस अंतःप्रेरणा से अष्टलक्ष्मी परशुराम फाउंडेशन की परिकल्पना ने आकार लिया है।
मुझे देशभर में प्रवास करने और समाज के विभिन्न वर्गों से निकटता से संवाद करने का अवसर मिला। मैंने देखा कि ब्राह्मण समाज की अनेक संस्थाएँ अपने-अपने स्तर पर शिक्षा, सेवा, संस्कार और सामाजिक उत्थान के लिए बहुत अच्छा और सराहनीय कार्य कर रही हैं। इन सभी संस्थाओं और उनके कार्यकर्ताओं के प्रयासों के प्रति मेरे मन में पूर्ण सम्मान है।
लेकिन इस व्यापक प्रवास और संवाद के दौरान एक बात मुझे लगातार महसूस हुई — इतने प्रयासों के बावजूद समाज के अंतिम छोर पर खड़े आर्थिक रूप से कमजोर परिवार, प्रतिभाशाली विद्यार्थी और अवसर की तलाश में भटकते युवा तक आवश्यक सहयोग और अवसर कई बार पूरी क्षमता के साथ नहीं पहुँच पाते।
मुझे लगा कि आवश्यकता प्रतिस्पर्धा करने की नहीं, बल्कि जो छूट गया है उस तक पहुँचने की है — “जो अंतिम पंक्ति में है, सबसे पहले उसका हाथ थामें।” और समाज में उपलब्ध संसाधनों को जरूरतमंद प्रतिभाओं से जोड़ने की है।
इसी अनुभव ने मेरे भीतर गैर-राजनीतिक, परिणाम-आधारित, राष्ट्रव्यापी सामाजिक तंत्र की आवश्यकता को और दृढ़ किया, जो सहायता को केवल घोषणा या आयोजन तक सीमित न रखे।
हमारा उद्देश्य केवल सहायता देना नहीं है। हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जिसमें —
हम सहायता लेने वाला समाज नहीं, एक-दूसरे को सक्षम बनाने वाला समाज बनाना चाहते हैं।
जय श्री परशुराम। · जय मां अष्टलक्ष्मी।
हम सहायता लेने वाला समाज नहीं, एक-दूसरे को सक्षम बनाने वाला समाज बनाना चाहते हैं। सक्षम व्यक्ति से समर्थ परिवार, समर्थ परिवार से सशक्त समाज और सशक्त समाज से समृद्ध राष्ट्र तक।